500 महारों ने 28000 पेशवाओं को हराया था, महार रेजीमेंट बहाल करने की उठाई मांग
चंदौली, जिले के सुदूर वनांचल नौगढ़ के बाघी स्थित डॉ अंबेडकर स्मारक स्थल पर बहुजन चिंतकों द्वारा शौर्य दिवस पर महारों की बहादुरी, बलिदान और मातृभूमि की रक्षा में किए गए वीर कार्यों को याद किया गया और उन्हें नमन करते हुए श्रद्धांजलि दी गई. जनपद के संभ्रांत नागरिकों और प्रबुद्ध जनों ने अपने अपने विचार रखा और उनके इतिहास को पुनः दोहराया.
इस दौरान भीम आर्मी जिलाध्यक्ष रामचंद्र राम ने बताया कि भीमा कोरेगांव मराठों पर दलितों की जीत का प्रतीक है.1जनवरी 1818 में 500 महारों ने 28000 मराठा साम्राज्य के ब्राम्हण पेशवा सैनिकों के बीच लड़ा था जिसमें महारों की जीत हुई थी. यह लड़ाई राजपाठ की नहीं महारों के सम्मान के जीत थी. इस जीत को शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया.
1जनवरी 1927 को बाबा साहब डॉ अंबेडकर उस स्मारक स्थल पर पहुंचकर अपने इतिहास को खंगाला और पुनः उन्होंने कलम के हथियार को अपनाकर अपने पूर्वजों के इतिहास से सबक लेकर बहुजन समाज की एक नई इबारत लिख डाली. जो बहुजन समाज को आगे बढ़ाने का प्रेरणा स्रोत बनी. इसी लिए बाबा साहब डॉ अंबेडकर के अनुयायियों द्वारा प्रतिवर्ष 1जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में याद किया जाता है. अपने संबोधन के अंत में सरकार से महार रेजीमेंट को पुनः बहाल करने की मांग उठाई.
वहीं वक्ता दिलबहार ने कहा कि भीमा-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस गांव से मराठा का इतिहास जुड़ा है. 207 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा सेना का नेतृत्व बाजीराव-द्वितीय कर रहे थे. बाद में इस लड़ाई को अनुसूचित जातियों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई.
इस दौरान अवधेश कुमार भारती, विजय भास्कर, प्रशांत कुमार, वीरेंद्र कनौजिया, महावीर, डॉ. अनिल कुमार, रिंकू कुमार, श्यामसुंदर भारती, रमेश कुमार, मनीष कुमार, राजकुमार सहित अन्य बहुजन चिंतक मौजूद रहे।