Hot Posts

6/recent/ticker-posts

मुम्बई के गोरेगांव में 'हरित‑अमृत' कार्यक्रम

धरती पर जीवन खतरे में, पर्यावरण संकट रोकने के लिए अब वैश्विक कदम जरूरी- डॉ. मुकेश गौतम 

रिपोर्ट ! धर्मेंद्र कुमार 

मुंबई — विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गोरेगांव (प.) में आयोजित 'चित्रनगरी संवाद मंच' के विशेष कार्यक्रम में प्रतिष्ठित कवि व लेखक डॉ. मुकेश गौतम ने चेतावनी दी कि बढ़ता पर्यावरण संकट मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है और इसे रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर समेकित, व्यापक व त्वरित प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि यदि अभी भी व्यापक और सार्थक कदम नहीं उठाए गए तो धरती पर मनुष्यता के लिए जीना कठिन हो जाएगा।

डॉ. गौतम ने अपने वक्तव्य में कहा कि हाल के वर्षों में ऋतुओं के पैटर्न और प्राणियों के व्यवहार में आए परिवर्तन — बाढ़, सूखा, भू‑जलकट का घटना, तालाब‑झीलों का सूखना तथा नदियों का कम बहना — साधारण घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि मानव गतिविधियों का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं, जो प्रकृति की ओर से कड़ी चेतावनी है। उन्होंने श्रोताओं को अपने काव्य के माध्यम से भी आगाह किया और अपनी प्रसिद्ध कविताएँ "जब जलता है जंगल", "धराली क्यों बहा" तथा "जंगल का संगीत" सुनाकर लोगों का ध्यान संकट की गंभीरता की ओर खींचा।

कार्यक्रम में पुस्तक 'हरित‑अमृत' पर वरिष्ठ पत्रकार विवेक अग्रवाल ने समीक्षात्मक लेख पाठ किया। मुंबई विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. कमर सिद्दीकी ने डॉ. गौतम के लेखकीय पक्ष और व्यक्तित्व पर अपने विचार रखे और कहा कि उनका साहित्य पर्यावरण चेतना को व्यापक जनसमूह तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन रहा है। उन्होंने लेखक की रचनात्मकता और सामाजिक जवाबदेही दोनों की प्रशंसा की।

प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता नुसरत खत्री और अफजल खत्री ने भी पर्यावरण संकट, स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने तथा सामुदायिक नेतृत्व की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। दोनों ने कहा कि केवल कविताएँ और बातें ही पर्याप्त नहीं — जमीन स्तर पर वृक्षारोपण, जल संचयन, प्रदूषण नियंत्रण और बायोडायवर्सिटी संरक्षण की योजनाओं को त्वरित रूप से व्यवहार में लाया जाना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन व्यंग्यकार व संचालक सुभाष काबरा ने किया। मंच पर डॉ. दमयंती दीप, डॉ. ममता झा, डॉ. मधुबाला शुक्ला, सत्यम आनंद, शैलेन्द्र श्रीवास्तव, नवीन चतुर्वेदी, ऋषि श्रीवास्तव, प्रदीप गुप्ता और गुलशन मदान ने भी पर्यावरण पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उपस्थित वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि स्थानीय स्तर पर समुदाय‑आधारित पहलों के साथ‑साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नीतिगत संहिताओं की भी आवश्यकता है, क्योंकि पर्यावरणीय समस्याओं का प्रभाव सीमाओं से परे है।

डॉ. गौतम ने अंत में पाठकों और नागरिकों से अपील की कि वे अपने दैनिक व्यवहार में छोटे‑छोटे परिवर्तन लाएँ — जल की बचत, वनों का संरक्षण, प्लास्टिक उपयोग में कमी और स्थानीय जल स्रोतों की सफाई जैसी आदतें अपनाएँ। उन्होंने कहा कि साहित्य और कला के माध्यम से जन चेतना जगाने का काम जारी रहेगा, पर सार्थक परिवर्तन तभी संभव है जब नीति‑निर्माता, उद्योग और आम जनता मिलकर ठोस कदम उठाएँ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नागरिक, साहित्यकार व पर्यावरणप्रेमी उपस्थित रहे और आयोजन की समापन कड़ी में 'हरित‑अमृत' पुस्तक की प्रतियों का विमोचन भी किया गया।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ