चंदौली के मुगलसराय शहर में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 15 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर भव्य झांकी जुलूस आयोजित किया जा रहा है। दामोदर दास पोखरे से प्रारंभ होकर मानसरोवर तालाब तक पहुंचने वाला यह जुलूस सामाजिक समानता, न्याय और संविधान निर्माता बाबासाहेब के आदर्शों को जीवंत करने का प्रतीक बन चुका है। स्थानीय संगठनों और अंबेडकरवादी कार्यकर्ताओं द्वारा संयोजित यह कार्यक्रम न केवल धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक जागरूकता का भी माध्यम है।
पिछले कई वर्षों से चली आ रही इस परंपरा की शुरुआत 20वीं सदी के मध्य से मानी जाती है, जब मुगलसराय के दलित और पिछड़े वर्गों ने बाबासाहेब के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए झांकी जुलूस की शक्ल दी। कल्पना कीजिए - सैकड़ों श्रद्धालु हाथों में तिरंगा, बाबासाहेब की प्रतिमा और संविधान की प्रति थामे, नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं: "जय भीम! जय भारत!" झांकी में डॉ. अंबेडकर को महामानव के रूप में दर्शाया जाता है - एक ओर वे संविधान सभा में भाषण दे रहे हैं, तो दूसरी ओर छुआछूत उन्मूलन का संदेश दे रहे हैं। दामोदर दास पोखरे का चयन इसलिए रोचक है क्योंकि यह प्राचीन जलाशय सामाजिक एकता का प्रतीक है, जहां से यात्रा शुरू होकर मानसरोवर तालाब जैसे पवित्र स्थल पर समापन होता है।
यह जुलूस केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश का कैरियर भी है। विगत वर्षों में इसमें हजारों लोग शामिल हुए हैं, जिनमें महिलाएं, युवा और बच्चे प्रमुख रहे। एक रोचक तथ्य - 2019 में इस जुलूस ने रिकॉर्ड 5 किलोमीटर लंबा सफर तय किया था, जिसमें 50 से अधिक झांकियां थीं। इस बार भी संगीत, नुक्कड़ नाटक और बाबासाहेब के प्रसिद्ध उद्धरणों जैसे "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" पर आधारित प्रदर्शन होंगे। आयोजकों का अनुमान है कि 15 अप्रैल, मंगलवार को सुबह 8 बजे शुरू होने वाला यह जुलूस दोपहर तक समाप्त होगा, जिसमें ट्रैफिक डायवर्जन और सुरक्षा के पूर्ण इंतजाम रहेंगे।
मुगलसराय जैसे छोटे शहर में यह आयोजन बाबासाहेब के सपनों को साकार करने की मिसाल पेश करता है। यदि आप भी इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो दामोदर दास पोखरे पर पहुंचें और जय भीम के नारों में शामिल हों!
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