सकलडीहा, चंदौली। सकलडीहा पीजी कॉलेज में ‘विकसित भारत @ 2047 : चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन देश-विदेश से आए शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार, तकनीकी विकास, ग्रामीण उन्नति, सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों समेत विकास के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। समापन सत्र में वक्ताओं ने विकसित भारत के लक्ष्य को समावेशी विकास, सामाजिक सहभागिता, उच्च शिक्षा, शोध और नवाचार से जोड़ते हुए शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया।

समाजशास्त्र विभाग और पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रातः प्रथम, द्वितीय और तृतीय सत्रों में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए विद्वानों ने विकसित भारत की अवधारणा के सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों पर अपने विचार साझा किए।



सत्रों में प्रो. कामना सिंह, राजनीति विज्ञान, राजकीय महाविद्यालय सैदपुर, प्रो. कुमुद सिंह, समाजशास्त्र, अग्रसेन पीजी कॉलेज वाराणसी, प्रो. आरपीएस सिंह, समाजशास्त्र, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, प्रो. सत्य प्रकाश, कुशीनगर, डॉ. कुशकुलदीप, प्रो. रजनीश कुंवर, प्राचार्य हरिश्चंद्र पीजी कॉलेज वाराणसी, डॉ. विश्वनाथ वर्मा, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ. शिवसहाय यादव, डॉ. दुष्यंत यादव, डॉ. राम विलास, प्रो. अजय कुमार सिंह, बीएचयू, डॉ. प्रियंका पांडेय, आरा तथा डॉ. विनोद कुमार यादव, अरुणाचल विश्वविद्यालय समेत विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

आर्थिक विकास के साथ सामाजिक सरोकार जरूरी

वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति का विषय नहीं है। इसके लिए समाज के सभी वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को गति देना और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना जरूरी है। तकनीकी प्रगति के साथ भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया।

वक्ताओं ने युवा शक्ति और उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि युवाओं की क्षमता को शिक्षा, कौशल, शोध और नवाचार के माध्यम से राष्ट्रीय विकास से जोड़ना महत्वपूर्ण है।

सामाजिक सहभागिता और समावेशी विकास पर जोर

समापन सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के प्रो. रमाकांत त्रिपाठी ने की। उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य को सामाजिक सहभागिता और समावेशी विकास से जोड़ते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में शिक्षा के साथ सामाजिक चेतना की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

विशिष्ट अतिथि बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग के प्रो. अरविंद जोशी ने भारतीय समाज में तेजी से हो रहे बदलावों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए सामाजिक असमानताओं को कम करना और विकास के अवसरों को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाना आवश्यक है।

जर्मनी से आए मुख्य वक्ता दिव्यराज अमिय ने वैश्विक संदर्भ में भारत की विकास यात्रा पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन-पद्धतियों से भी सीखने की आवश्यकता है। उन्होंने आदिवासी जीवन से सीखने, अकेलेपन और वृद्धावस्था जैसी वैश्विक समस्याओं पर विचार करने की जरूरत बताई। भारतीय प्रतिभा, युवा शक्ति और तकनीकी क्षमता को उन्होंने देश की महत्वपूर्ण ताकत के रूप में रेखांकित किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा, शोध और नवाचार पर चर्चा

विशिष्ट अतिथि एवं टीडी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. जगदीश दीक्षित ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के बीच समन्वय को विकसित भारत के लिए महत्वपूर्ण बताया। मलिकपुरा पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. दिवाकर सिंह ने उच्च शिक्षा, शोध और नवाचार को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया।

कॉलेज के प्राचार्य प्रो. प्रदीप कुमार पांडेय ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि विकसित भारत का सपना शिक्षा, शोध, नवाचार और सामाजिक जिम्मेदारी को साथ लेकर आगे बढ़ने से ही साकार हो सकता है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन विद्यार्थियों और शोधार्थियों को व्यापक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने में सहायक होते हैं।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने भी वक्ताओं के विचारों पर संवाद किया और अपने प्रश्न एवं विचार रखे।

दो दिवसीय आयोजन की रिपोर्ट प्रस्तुत

संगोष्ठी के संयोजक प्रो. दयाशंकर यादव ने दो दिवसीय आयोजन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस दौरान एसोसिएट प्रोफेसर अजय कुमार यादव को पुस्तकालय के लिए बेस्ट अवार्ड प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजय यादव ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दयानिधि सिंह यादव ने किया।

संगोष्ठी को सफल बनाने में सह संयोजक डॉ. रजनीश गुप्ता और डॉ. अनामिका सिंह, सचिव डॉ. श्यामलाल यादव तथा डॉ. वंदना कुमारी समेत आयोजन से जुड़े शिक्षकों की सक्रिय भूमिका रही।