लोकुआ में अंबेडकर जयंती का अभूतपूर्व उत्साह, समानता शिक्षा और संघर्ष का संकल्प
चंदौली जिले के धानापुर ब्लॉक स्थित बहादुरपुर लोकुआ गांव में डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती पर अभूतपूर्व उत्साह और प्रेरणा का सैलाब उमड़ पड़ा। लॉर्ड बुद्धा डॉ. अंबेडकर सेवा समिति (LBDASS) के तत्वावधान में सामुदायिक केंद्र में आयोजित इस भव्य समारोह में सैकड़ों ग्रामीण, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता एकजुट हुए। बाबासाहेब के समानता, शिक्षा और न्याय के अमर आदर्शों से प्रेरित यह जमावड़ा ग्रामीण भारत में सामाजिक क्रांति की नई चिंगारी बन गया। याद रहे, डॉ. अंबेडकर ने 14 अप्रैल 1891 को जन्म लिया और भारत के संविधान के प्रमुख शिल्पकार बने—उनके विचार आज भी करोड़ों शोषितों की आवाज हैं।
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सुनील गौतम का प्रखर उद्बोधन: सामाजिक न्याय की पुकार
मुख्य अतिथि सुनील कुमार गौतम ने अपने प्रेरक भाषण से माहौल को और गर्म कर दिया। डॉ. अंबेडकर के सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करते हुए उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता पर जोर दिया। उनका स्पष्ट संदेश था, "राजनीतिक स्वतंत्रता बिना सामाजिक स्वतंत्रता के व्यर्थ है।" उन्होंने कहा कि भारत में वोट का अधिकार तभी पूर्ण होगा, जब जातिगत भेदभाव की जड़ें उखड़ जाएंगी। अंबेडकर जयंती को उन्होंने शिक्षा, संगठन और संघर्ष की प्रेरणास्रोत बताया, जो सामाजिक सुधार और संविधान रक्षा का प्रतीक है। गौतम ने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब यह गांव-गांव, हर वर्ग तक पहुंचे। उनका यह कथन गांववालों के दिलों में बस गया, जो सच्ची आजादी की खोज में जुटे हैं।
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संविधान के स्तंभ: लल्लन कुमार का संकल्पमय संबोधन
कार्यक्रम की अध्यक्षता LBDASS के प्रदेश महामंत्री लल्लन कुमार ने की। उन्होंने भारतीय संविधान को बाबासाहेब का अमूल्य उपहार बताते हुए अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), 15 (भेदभाव का निषेध) और 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) पर प्रकाश डाला। ये प्रावधान शोषित समाज को मजबूत नींव देते हैं। लल्लन ने कहा, "शिक्षा ही वह सर्वोच्च हथियार है, जो अन्याय के खिलाफ सबसे कारगर साबित हुआ है।" युवाओं से बाबासाहेब के मार्ग—'शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो'—पर चलने का आह्वान किया, जो 1940 के दशक से अंबेडकर की जयघोषी पुकार है।
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विशिष्ट अतिथियों का योगदान: प्रेरणा का सैलाब
रामसुभाष (पूर्व रेलवे विधि अधिकारी) ने समिति के मूल्यों—रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान—पर फोकस करते हुए अंबेडकर के मंत्र को जीवंत किया। उनका जोश युवाओं को संगठित होने की प्रेरणा दे गया।
पूर्व प्राचार्य रमेश कुमार भारती ने शोषित वर्गों के उत्थान के लिए बाबासाहेब के साहसिक संघर्ष को याद दिलाया। उन्होंने अंबेडकर के जीवन से प्रेरित होकर बताया कि कैसे छुआछूत के खिलाफ उनकी लड़ाई ने लाखों को मुक्ति दी।
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गणेश प्रसाद (जिला पंचायत सदस्य, धानापुर) ने निर्भयता, सामाजिक न्याय, समानता और संविधान निर्माण जैसे विचारों पर चलने का संदेश दिया। उनका आह्वान था कि ग्रामीण भारत इन आदर्शों को अपनाकर प्रगति की नई ऊंचाइयां छुए।
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'जय भीम' के नारों में समापन: नई आशा की किरण
'जय भीम' के गगनभेदी नारों के बीच समारोह का समापन हुआ, जो ग्रामीण भारत में समानता और प्रगति की नई उम्मीद का प्रतीक बन गया। यह उत्सव न केवल जयंती का पर्व था, बल्कि सामाजिक जागृति का प्रेरणादायी मंच सिद्ध हुआ। लोकुआ गांव ने साबित कर दिया कि बाबासाहेब के सपने आज भी जीवित हैं—और इन्हें साकार करने का संकल्प अटल है।
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कार्यक्रम का सफल संचालन उमेश कुमार भारती ने किया। बाबा साहब के विचारों और आदर्शों पर चलने वालों में अरुण रत्नाकर, निठोहर सत्यार्थी, सोनू पटेल, विनय कुमार, ज्ञानचंद कांत श्रवण कुशवाहा, रामदुलार कनौजिया, डॉ. संतोष मौर्य, उदई भास्कर, आशुतोष कुमार, गुलाब राम, मौलवी, पन्ना, खरपत, छोटू दशमी, रामकुवर गोंड, राजीव भारती, विनोद, सुजीत , बृजेश, संतोष कुमार सहित सैकड़ों महिलाएं पुरुष और भविष्य के कर्णधार थे।
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