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चंदौली का 'अवैध स्वास्थ्य साम्राज्य'

बिना लाइसेंस के सैकड़ों अस्पताल, RTI कार्यकर्ता की पुकार पर कानून की खामोशी।


चंदौली। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में जन स्वास्थ्य का काला कारोबार जोरों पर है। सैकड़ों अवैध निजी अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लिनिक, पैथोलॉजी सेंटर और मेडिकल स्टोर बिना किसी वैध पंजीकरण के खुलेआम फल-फूल रहे हैं। इनकी चपेट में गरीब मरीजों की जानें दांव पर लग रही हैं, लेकिन प्रशासन की आंखें बंद। RTI कार्यकर्ता ओमकार नाथ तिवारी की बार-बार की गुहार पर न जिलाधिकारी, न मुख्य चिकित्सा अधिकारी और न ही ड्रग इंस्पेक्टर ने कानून का पालन किया। शिकायत पर छापेमारी का ड्रामा तो रचा जाता है, लेकिन 'जादू की छड़ी' से ये संस्थान सेकंडों में लाइसेंस लेकर फिर खुल जाते हैं। आखिर यह सिलसिला कब थमेगा?

RTI का 'मृत हथियार': दर्जनों आवेदन, जीरो जवाब
सोशल एक्टिविस्ट ओमकार नाथ तिवारी ने पिछले दो वर्षों में जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) और ड्रग इंस्पेक्टर कार्यालयों में 25 से अधिक RTI आवेदन दाखिल किए। उन्होंने स्पष्ट सवाल पूछे—धानापुर ब्लॉक समेत पूरे जिले में कितने अनधिकृत चिकित्सालय चल रहे हैं? कितनों का पंजीकरण समाप्त हो चुका है? कितनी नशीली दवाओं की बिक्री पकड़ी गई? लेकिन RTI अधिनियम 2005 का खुला उल्लंघन करते हुए जन सूचना अधिकारियों ने एक भी जानकारी नहीं दी। तिवारी ने राज्य सूचना आयोग लखनऊ को शिकायत की, लेकिन वहां भी खामोशी। नतीजा? भ्रष्टाचार के खिलाफ RTI का यह मजबूत हथियार चंदौली में मृतप्राय हो गया। एक अनुमान के मुताबिक, जिले में 200 से ज्यादा ऐसे अवैध संस्थान सक्रिय हैं, जहां बिना योग्य डॉक्टरों के ऑपरेशन हो रहे हैं।

छापेमारी का फर्जीवाड़ा: सील होते ही 'लाइसेंस जादू'
कुछ महीनों पहले तिवारी की शिकायत पर प्रशासन हरकत में आया। जिले में विशेष जांच टीम गठित हुई, धानापुर, हेतिमपुर और सोनभद्रा सीएचसी के आसपास छापे मारे गए। अवैध पैथोलॉजी सेंटरों के शटर गिरा दिए गए, नशीली दवाओं के ढेर जब्त हुए। अधिकारियों ने संचालकों को सख्त चेतावनी दी—'दुकान न खोलना, अन्यथा सख्त कार्रवाई!' लेकिन अगले ही दिन चमत्कार! संचालक कार्यालय पहुंचे, थोड़ी 'फीस' चुकाई और up-health.in व clinicalestablishment.gov.in पोर्टल पर लाइसेंस 'मंजूर'। सकलडीहा का एक सील पैथोलॉजी सेंटर आज भी धड़ल्ले से चल रहा है, जबकि धानापुर में सीज कई अस्पताल बिना बुनियादी सुविधाओं के मरीजों को 'उपचार' दे रहा है। यह 'छापा-लाइसेंस' चक्र भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें दर्शाता है।

ढुलमुल नियम: जन स्वास्थ्य पर 'जहर का खेल'
उत्तर प्रदेश शासन के स्पष्ट आदेश हैं—सभी निजी चिकित्सालयों का पंजीकरण up-health.in पोर्टल पर अनिवार्य। न्यूनतम मानक तय हैं: योग्य डॉक्टर (MBBS/MD), ऑक्सीजन प्लांट, फायर सेफ्टी, स्टेरलाइजेशन यूनिट। लेकिन चंदौली में ये नियम कागजों तक सीमित। ड्रग इंस्पेक्टर की छापों में हजारों नशीली गोलियां जब्त हुईं, फिर भी कोई स्थायी कार्रवाई नहीं। एक उदाहरण लें—धानापुर के एक क्लिनिक में BAMS डॉक्टर सर्जरी कर रहे थे, जहां साफ-सफाई के नाम पर धूल ही धूल। ऐसे संस्थानों से फैलने वाली बीमारियां जिले के लिए 'मौत का खतरा' बन रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है, यदि 10% भी अवैध दवाएं घुलमिल जाएं, तो महामारी फैलना तय।


प्रशासन-आयोग की उदासीनता: भ्रष्टाचार का 'खुला बाजार
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार-विरोधी भाषणों से जिले को चेताते रहते हैं, लेकिन जमीन पर सच्चाई उलट। जन सूचना अधिकारी कानून को ठेंगा दिखाते हैं, राज्य सूचना आयोग शिकायतों पर 'संज्ञान' लेना भूल गया। मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत आती है तो छापेमारी होती है, लेकिन जड़ें सूखती नहीं। तिवारी जैसे कार्यकर्ता अनेकों लड़ रहे हैं, लेकिन बिना सरकारी समर्थन के यह लड़ाई नामुमकिन। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो चंदौली का स्वास्थ्य तंत्र पूरी तरह 'भ्रष्टाचार का अड्डा' बन जाएगा—जहां मरीजों की जानें व्यापार का पण बनेंगी। जिले के लोग सतर्क हों। अवैध संस्थानों की सूची साझा करें, शिकायत दर्ज कराएं। क्या प्रशासन अब जागेगा?

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