कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने विकसित भारत के लक्ष्य पर चर्चा करते हुए कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए शिक्षा और ज्ञान को विकास की केंद्रीय शक्ति बनाना होगा। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को समाज की वास्तविक समस्याओं पर शोध कर उनके व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने की दिशा में भी काम करना चाहिए।
उन्होंने युवाओं की प्रतिभा, नवाचार और उद्यमशीलता को अवसर देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार युवाओं की क्षमता का सही उपयोग देश के विकास को नई दिशा और गति दे सकता है।
विशिष्ट अतिथि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के सदस्य डॉ. हरेंद्र कुमार राय ने शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक की भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा की आवश्यकता बताते हुए कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, जिसमें ज्ञान के साथ कौशल और सामाजिक उत्तरदायित्व भी शामिल हो। उन्होंने युवाओं से बदलती तकनीकी परिस्थितियों के अनुरूप अपने ज्ञान और कौशल को विकसित करने का आह्वान किया।
पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी के कार्यकारी निदेशक डॉ. श्री प्रकाश पाण्डेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को विकसित भारत की आधारभूमि बताया। उन्होंने कहा कि देश के विकास को केवल आर्थिक प्रगति के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों का संरक्षण भी आवश्यक है। भारतीय परंपरा में मौजूद ज्ञान और समावेशी दृष्टिकोण को वर्तमान आवश्यकताओं से जोड़कर विकास की अवधारणा को व्यापक बनाया जा सकता है।
मुख्य वक्ता त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल के कृष्ण प्रसाद ने भारत और नेपाल के बीच शैक्षिक एवं सांस्कृतिक संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने दक्षिण एशिया के विकास में दोनों देशों के बीच परस्पर सहयोग की आवश्यकता बताई। शिक्षा, संस्कृति और शोध के क्षेत्र में भारत और नेपाल के सहयोग को और व्यापक किए जाने की संभावनाओं पर भी उन्होंने विचार रखे।
पुस्तक का हुआ लोकार्पण
संगोष्ठी के दौरान डॉ. दयाशंकर यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘विकसित भारत @2047 में युवाओं की संकल्पसिद्धि’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक के माध्यम से विकसित भारत के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका और उनकी भागीदारी से जुड़े विषयों को सामने रखा गया।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. दयाशंकर यादव ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विकसित भारत@2047 केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं है, बल्कि इसके दायरे में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और मानवीय विकास भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के अकादमिक आयोजनों से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों को राष्ट्रीय महत्व के समसामयिक विषयों पर विचार-विमर्श करने का अवसर मिलता है। शोध और अकादमिक विमर्श के माध्यम से देश के सामने मौजूद चुनौतियों को समझने तथा उनके समाधान की दिशा में नए विचार सामने आ सकते हैं।
शोध-पत्रों में विकसित भारत के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा
संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने विकसित भारत@2047 से जुड़े अलग-अलग विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इनमें शिक्षा, समाज, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, युवा शक्ति, तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय प्रमुख रहे।
प्रतिभागियों ने अपने शोध के आधार पर विकसित भारत के सामने मौजूद चुनौतियों और संभावित समाधानों पर चर्चा की। शोध-पत्रों में देश के विकास को शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने के साथ तकनीकी प्रगति तथा युवाओं की भूमिका पर भी विचार रखा गया।
तकनीकी सत्रों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे शोध को साझा करना और विकसित भारत की अवधारणा के अलग-अलग पक्षों पर अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाना रहा।
ग्रामीण-शहरी अंतर कम करने और युवाओं को कौशल से जोड़ने पर जोर
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में डॉ. सुरेंद्र प्रताप यादव, सादात पीजी कॉलेज, सादात, गाजीपुर, डॉ. सत्यदेव प्रजापति, प्रो. मिथिलेश तथा डॉ. साधना यादव ने विकसित भारत की अवधारणा के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
वक्ताओं ने कहा कि भारत के समग्र विकास के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच विकासात्मक अंतर को कम करना आवश्यक है। इसके साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विस्तार, युवाओं को रोजगार और कौशल से जोड़ना तथा सामाजिक समावेशन को मजबूत करने की जरूरत बताई गई।
वक्ताओं ने भारत की विशाल युवा आबादी को देश के लिए महत्वपूर्ण संसाधन बताते हुए कहा कि युवाओं की क्षमता का उपयोग शिक्षा, कौशल, रोजगार, नवाचार और राष्ट्र निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में किया जाना आवश्यक है।
संगोष्ठी के पहले दिन हुए विमर्श में शिक्षा और शोध को विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने के साथ भारतीय संस्कृति, सामाजिक मूल्यों, तकनीकी बदलाव और युवा शक्ति जैसे विषयों पर भी विचार सामने आए। आयोजन के दूसरे दिन भी विषय से जुड़े अकादमिक सत्रों में विचार-विमर्श और शोध-पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।