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चंदौली में किसानों को सिखाया मृदा पोषण और जैविक खेती का कम लागत वाला 'सुपर फॉर्मूला'

चंदौली। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज (अयोध्या) के कृषि विज्ञान केंद्र और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी ने मिलकर चंदौली के किसानों को 'संतुलित उर्वरक, उचित प्रबंधन, स्वस्थ मिट्टी, समृद्ध किसान' थीम पर एक क्रांतिकारी जागरूकता अभियान चलाया। केंद्र के सभागार में हुई इस कार्यशाला में 65 से अधिक किसानों और महिला कृषकों ने हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने मृदा स्वास्थ्य, संतुलित पोषण प्रबंधन और जैविक खेती के ऐसे आसान तरीके बताए, जो रसायनों पर निर्भरता घटाकर उत्पादन दोगुना कर सकते हैं—बिना जेब ढीली किए।
मिट्टी परीक्षण से शुरू करें 'स्मार्ट फार्मिंग'
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के डॉ. नीरज सिंह ने साफ शब्दों में कहा, "मिट्टी का परीक्षण करवाएं, फिर उर्वरक डालें!" यह तरीका लागत 30-40% तक कम कर सकता है, उत्पादन बढ़ाएगा और जमीन की उर्वरता सदियों तक बरकरार रखेगा। उन्होंने जल संरक्षण और आधुनिक तकनीकों पर जोर दिया—जैसे ड्रिप इरिगेशन से पानी की बचत, जो गर्मी के मौसम में 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है। बिना परीक्षण के उर्वरक डालने से 50% खाद बेकार चली जाती है, जो किसानों का सालाना लाखों का नुकसान।

बीज उपचार का प्राकृतिक 'शील्ड'
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभयदीप गौतम ने बीज उपचार के जैविक राज खोले। प्राकृतिक विधियों से बीज रोगों से बचे रहते हैं, अंकुरण 20-25% तेज होता है और फसल की शुरुआत मजबूत! कोई महंगा रसायन नहीं—बस गोमूत्र, गोबर और कुछ जड़ी-बूटियां मिलाकर तैयार। यह कम लागत वाला तरीका फसल की गुणवत्ता इतनी बढ़ा देता है कि बाजार में दोगुनी कीमत मिल सकती है।

सूक्ष्मजीवों की 'पोषक तत्व फैक्ट्री'
डॉ. सुदर्शन मौर्य ने बताया कि मिट्टी के सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स) असली हीरो हैं। ये फास्फोरस, पोटाश जैसे तत्वों को घोलकर पौधों तक पहुंचाते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत आधी हो जाती है। कल्पना करें—आपकी मिट्टी खुद ही 'फर्टिलाइजर प्लांट' बन जाए! इससे पौधे मजबूत बढ़ते हैं और पर्यावरण भी सुरक्षित।

घनजीवामृत: जैविक खेती का 'मास्टर ब्लेंड'
कृषि प्रसार वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार सिंह ने घनजीवामृत की रेसिपी शेयर की—गोबर, गोमूत्र, गिलोय जैसी सामग्री से बनी यह खाद मिट्टी को जीवंत बनाती है। उन्होंने प्राकृतिक खेती के अन्य आयाम भी चर्चा में लाए, जैसे फसल चक्रण जो मिट्टी को थकानमुक्त रखता है।

जैव एजेंट्स से रोग-रोधी 'आर्मी'
डॉ. ए.एन. त्रिपाठी ने ट्राइकोडर्मा और पीएसबी जैसे जैव एजेंट्स की ताकत बताई। ये फसलों को रोगों से लड़वाते हैं, मिट्टी सुधारते हैं और उत्पादन 15-20% बढ़ाते हैं। पर्यावरण संरक्षित, आय दोगुनी

अतिरिक्त टिप्स: मिट्टी से पशु संरक्षण तक
मृदा परीक्षण गाइड (डॉ. चंदन सिंह): कब—बुआई से 15 दिन पहले; क्यों—पोषक कमी पकड़ने के लिए; कैसे—नजदीकी केंद्र पर नमूना दें। फलदार वृक्षों के लिए (श्री मनीष सिंह) जीवामृत और घनजीवामृत से फल मोटे-रसीले। लू से पशु बचाव (डॉ. प्रतीक सिंह): छायादार गोशाला, पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स मिलाएं—मृत्यु दर 50% कम
कार्यक्रम में किसानों ने अपनी समस्याओं पर विशेषज्ञों से सीधे सलाह ली। यह अभियान न सिर्फ खेती को जैविक बनाएगा, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर भी।

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