लक्ष्य पूरे, पेड़ नहीं — रोपाई के बाद निगरानी का अभाव, माँगा ट्रांसपेरेंसी रिकार्ड
चंदौली, 12 जुलाई 2026: हर वर्ष देशभर में बड़े पैमाने पर आयोजित वृक्षारोपण अभियानों के बावजूद स्थानीय धरातल पर आशाएँ कुंद्रित हो रही हैं। किसान नेता पिंटू पाल का कहना है कि अभियान केवल फोटो-सेशन और दावे के स्तर तक सिमट कर रह गए हैं; लाखों लगाये गए पौधे कुछ ही महीनों में सूख कर नष्ट हो जाते हैं और जन-धन व्यर्थ चला जाता है।
पृष्ठभूमि के तौर पर सरकारी विभाग, जनप्रतिनिधि, शैक्षणिक संस्थान और सामाजिक संगठन बड़े-बड़े आंकड़े देते हैं और ‘लक्ष्य पूरे’ होने की घोषणाएँ करते हैं। लेकिन स्थानीय निगरानी और नियमित देखभाल के अभाव में कई स्थानों पर नई रोपाई का जीवनकाल अत्यंत सीमित रहता है। सिंचाई, सुरक्षा, जैविक खाद और समय-समय पर रोग-नियंत्रण न मिलने से पौधे पेड़ बनने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। परिणामस्वरूप सार्वजनिक प्रयास और धन का वास्तविक परिणाम नहीं दिख पाता।विशेषज्ञों की राय में केवल पौधे लगाने और तस्वीरें खिंचवाने से सार्थक हरियाली नहीं आएगी।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा कि अभियानों की सफलता का मानक "जीवित रहने की दर" (survival rate) होना चाहिए और इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने नियमित सिंचाई, बाड़ा बनवाना, जैविक खाद का प्रावधान, स्थानीय समुदायों को शामिल करना तथा पौधों की आरोग्य-देखभाल की स्पष्ट रणनीति अपनाने का सुझाव दिया।
पिंटू पाल की आपत्तियाँ और मांगे:
1- प्रत्येक वृक्षारोपण अभियान की स्वतंत्र निगरानी कराई जाए।
लगाये गए पौधों के 'जीवित रहने का प्रतिशत' सार्वजनिक किया जाए।
2- पौधारोपण के बाद कम-से-कम 2–3 वर्षों के लिये निगरानी, सिंचाई और सुरक्षा का बजट सुनिश्चित किया जाए।
3- संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए ताकि अभियान केवल कागज और तस्वीरों तक सीमित न रहे।
4- पिंटू पाल ने कहा, "हम हर साल बड़े-बड़े आंकड़े देखते हैं, पर जमीन पर अगर पौधे बचेंगे ही नहीं तो यह सब व्यर्थ है।" उन्होंने पारदर्शिता और खर्च का लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की भी मांग उठायी।
सरकारी जवाबदेही पर सवाल:
किसान नेता ने आरोप लगाया कि अधिकारी अक्सर रिपोर्ट में लक्ष्य पूरा होने का दावा कर देते हैं, जबकि जमीन पर सूख-प्रतिवेदन और कम होती जीवितता के आंकड़े सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि खर्च और रख-रखाव के रिकॉर्ड सार्वजनिक किए बिना सार्थक मूल्यांकन संभव नहीं है।
आगे की रूपरेखा:
पर्यावरण कानूनों और नीतिगत जानकारों के सुझावों के अनुरूप पिंटू पाल ने कहा कि हर अभियान के लिए पूर्व, दौरान तथा पश्चात स्वतंत्र मॉनिटरिंग आवश्यक है। उन्होंने स्थानीय समुदायों व ग्राम पंचायतों को देखभाल की जिम्मेदारी देकर निगरानी में पारदर्शिता लाने का प्रस्ताव रखा। "आज आवश्यकता केवल रोपण की नहीं, संरक्षण की है," पिंटू पाल ने कहा, "क्योंकि एक जीवित पेड़ ही आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और संतुलित जलवायु दे सकता है।"
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