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निश्छल भक्ति से ही मानव की सदगति संभव - स्वामी रत्नेशाचार्य

मारूफपुर में चल रही श्रीमदभागवत कथा महापुराण के चौथे दिन भक्त प्रह्लाद की सुनाई कथा ।

चंदौली,
चहनियां। मनुष्य को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में प्राप्त करना होता है। प्रभु भक्ति से विहीन जनमानस को कष्ट पहुंचाने वाले लोगों की आत्मा जन्म जन्मांतर भटकती रहती है, जबकि निश्छल भक्ति से मनुष्य को सदगति प्राप्त होती हैं। ये बाते क्षेत्र के मारूफपुर स्थित रामअवतार यादव के आवास पर चल रही सप्ताह व्यापी श्रीमद्भागवत कथा महापुराण प्रवचन के चौथे दिन स्वामी रत्नेशाचार्य जी महाराज ने कथावाचन के दौरान उपस्थित भक्तजनों से कही।

स्वामी रत्नेशाचार्य ने आगे बताया कि अहंकारी चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, वह एक न एक दिन नष्ट जरूर होता है।हिरण्यकश्यप को भी ब्रम्हा से प्राप्त वरदान के कारण अहंकार हो गया था कि उसे समूचे ब्रम्हांड में कोई नहीं मार सकता। अहंकार में चूर होकर वह स्वयं को ही भगवान कहने लगा और दूसरों से भी अपने को भगवान कहलवाले लगा।

 अपने पुत्र प्रह्लाद के भगवान विष्णु की पूजा करने पर उन्हें जान से मारने का प्रयास किया। तब भगवान श्रीहरि नरसिंह का रूप धारण कर हिरण्यकश्यप को मारकर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। उन्होंने कहा कि यदि भक्ति सच्ची और पूरी श्रद्धा से हो तो भगवान को भी भक्त के लिए आना पड़ता है।

किंतु मनुष्य माया में पड़कर चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है, जबकि प्रभु भक्ति से वह इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य के अच्छे कर्मों से ही उसके ईशलोक और इहलोक का निर्माण होता है।

फोटो - मारूफपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा महापुराण में कथावाचन करते स्वामी रत्नेशाचार्य जी महाराज।

   इस अवसर पर पूर्व ग्राम प्रधानपति रामअवध यादव, बालेश्वर पांडेय, रामअवतार यादव, श्यामनारायण यादव, यज्ञनारायण, नरसिंह यादव, श्यामबली यादव आदि लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे।

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