काव्य संग्रह : भूख बावली हो पीट रही थाली, प्यास पागल फिरती नाली नाली-राधेश विकास
भूख बावली हो पीट रही ताली।
प्यास पागल फिरती नाली नाली।।
मुरछित से हैं खेत खलिहान,
आवाक पेड़ देख रहा टूटती डाली।।
तुम्हारा निमंत्रण भला कैसे स्वीकार करें हम ,
पंगत तो एक है फिर अलग क्यों है थाली।।
सच बोलने का गुनाह मैं करता हूँ,
पर लगता जैसे तुमको पड़ती हो गाली।।
जब सारे सरदारों की है तेरी सरदारी,
फिर कैसे आम आदमी लगता गुंडा मवाली?
सब सियासी नजर का मायाजाल है प्यारे,
जाली नोट कहाँ पकड़ती है नजर जाली?
कमाल का तू कमाल का तेरा जादू,
"विकास" सब देख रहे हैं होते दाल काली।।