पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह मंडल मसीहा-दिनेश चन्द्र
नई दिल्ली। भारत के पूर्व प्रधामन्त्रियो की सूची में देश के आठवें प्रधानमंत्री के रूप में एक नाम वी.पी.सिंह जी का भी आता है. आज की तारीख में राजनीतिक गलियारों में या चट्टी - चौराहों पर इनका नाम लेते ही कुछ लोग नाक -भौंह सिकोड़ने लगते है. इनका ताल्लुक उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद स्थित राजा माण्डा के राजघराने से रहा है.
ईमानदार और संवेदनशील व्यक्तित्व वाले वी.पी.सिंह जी एक मंझे हुए राजनेता के साथ साथ कुशल चित्रकार भी थे. इनकी बनाई पेंटिंग चित्रकला जगत में अपना स्थान रखती है. इनका चित्रकार होना इस बात का परिचायक है कि यह एक सहृदय और सच्चे इंसान रहे होंगे.
लेकिन एक बिडम्बना यह भी है कि महान पुरुषों को अच्छे और बुरे दोनो दौर से गुजरना होता है. वक़्त और सियासत व्यक्ति को जीते जी ही नायक से खलनायक बना देती है. वी. पी. सिंह जी ने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान देश के दलितों - पिछड़ों को हक़ दिलाने और उनके उत्थान के पक्ष में जो फैसला लिया, उसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
युवावस्था से ही राजनीति की समझ रखने वाले वी पी सिंह यानि कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जी का लंबा राजनैतिक अनुभव रहा है । सामंती परिवार में जन्मे वी पी सिंह को समाज की खाई का पता था और हिन्दू समाज मे व्याप्त ऊंच - नीच के भेद-भाव की समझ भलीभाँति थी. यही वजह रही होगी कि उनके अपने राजनीति के निहित स्वार्थ के केंद्र बिंदु में गरीब पिछड़े लोग शामिल थे.
जो इनको दूसरे सवर्ण राजनेताओं से अलग सोच का सामाजिक समावेशी नेता बनाता है. वैसे तो देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के साथ लोकसभा, राज्यसभा के सदस्य होने के साथ साथ केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालयों में कैबिनेट मंत्री रहे. एक लंबा राजनीतिक अनुभव साथ रहा जो उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ले गया. प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तक राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की छबि देश के आम जनमानस में विशेषकर युवाओं में एक हीरो वाली छबि थी.
एक ऐसा नायक जिसने केंद्रीय मंत्री रहते हुए राजीव गाँधी की सरकार में बोफोर्स और पनडुब्बी संबंधी रक्षा सौदे में हुई करोड़ो की कमीशनखोरी और दलाली को उजागर किया. कांग्रेस की सरकार को जोर का झटका लगा. इन आरोपों की आँच में केंद्र की सरकार झुलस गई और बाद के हुए आम चुनाव में बड़ी पार्टी होते हुए भी सत्ता से बेदखल हो गयी.
भारत की जनता ने वी पी सिंह को सिर माथे बिठा लिया था. हुए आम चुनाव में अब जनता दल दूसरी बड़ी पार्टी थी. बीजेपी और वामदलों के सहयोग से सरकार बनी थी. देश भर में चारो ओर "राजा नही फ़क़ीर है - देश की तकदीर है" के नारे गूँजने लगे थे.
वी.पी.सिंह जी सबके हितों के रक्षक एक सच्चे, ईमानदार और अपने निर्णय पर अडिग रहने वाले दूरदर्शी राजनेता थे. सामाजिक न्याय के इस पुरोधा ने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का कठोर ऐतिहासिक फैसला लिया.
जो बाद में चलकर वी पी सिंह को तो ग्रस लिया लेकिन देश के दलितों-पिछड़ों के आर्थिक उन्नति का सूरज उगा गए जिसका ताप अभी तक महसूस किया जाता है. भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का सत्प्रयास और उनकी दूरदर्शिता भी फलीभूत होने वाली थी जो वी पी सिंह के साहसिक निर्णय से मूर्तरूप ले लिया. भारतीय संविधान में पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का प्रावधान था.
संविधान निर्माण के दौरान देश के मूल निवासियों अर्थात अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के वंचित समाज के लिए आयोग और आरक्षण का प्रावधान किया जा रहा था तब महात्मा गांधी जी का पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर अलग राय थी. फिर भी पिछड़ों के आर्थिक समुन्नत और समाज मे बराबर की भागीदारी के लिए आयोग के गठन का प्रावधान संविधान में किया गया.
वी पी सिंह सरकार के मंडल कमीशन के सिफारिशों को लागू करने के फ़ैसले ने देश भर में निवास करने वाले बहुसंख्यक पिछड़ा वंचित समाज को सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी मिल गयी. इसे लागू करने वाली अधिसूचना 13 अगस्त , 1990 को जारी कर दी गयी. पिछड़ों को मिला सामाजिक न्याय समाज के कुछ लोगो को रास नही आया.
इसके विरुद्ध वर्चस्ववादी सवर्ण मानसिकता वाले, सामंती विचारधारा वाले नेताओ, तथाकथित बुद्धिजीवियों की लामबंदी शुरू हो गयी. आम चुनाव में पराजित ताकतों को बैठे बैठाए एक मुद्दा मिल गया. मंडल कमीशन की सिफारिश के लागू होते ही देश मे बेरोजगारी अचानक से बढ़ गयी. जन्मजात प्रतिभा सम्पन्न सोकाल्ड लोगों का अहित होने लगा तथा हाथ से नौकरियों का अवसर रातोरात चला गया.
देश से प्रतिभा पलायन होंने के तर्क दिए जाने लगे. कूढ़मगज वालो के पेट मे दर्द होने लगा. पूरा देश मंडल कमीशन की आग में जलने लगा. उस समय विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, सार्वजनिक स्थानों और चौराहे चौराहे पर वी पी सिंह का पुतला फूँकने का दौर जारी हो गया। सरकार पर दबाव बनाने के लिए नवयुवकों , छात्रों ने आत्मदाह तक की घोषणाएं की.
कुछ ने आत्मदाह का भी प्रयास किया. पूरे देश मे अराजकता का माहौल तैयार होने लगा, मानों वी पी सिंह ने बड़ा पाप कर दिया हो. जो कल तक नायक था, आज खलनायक हो गया. स्वच्छ , साफ सुथरी राजनीति के इस धूमकेतु की आभा निस्तेज होने लगी थी.
इस बात को लेकर उनके कुल, खानदान और जाति पर अभद्र टिप्पणियां होने लगी. "राजा नही रंक है - देश का कलंक है " का नारा गाँव-गाँव, शहर-शहर, नगर- नगर गूँज उठा. सामाजिक न्याय के अंतर्गत अपने ही देश के नागरिकों को समान अधिकार मिलना जुर्म हो गया.
उन दिनों मंडल कमीशन की आग में झुलस रहे देश मे एक दिलचस्प बात यह थी कि पिछड़ों के लिए मिला 27% का आरक्षण ठीक से लागू भी नही हो पाया था कि आरक्षण के नाम पर अनुसूचित जाति समुदाय के लोगो की जगह जगह कुटाई और मार- पिटाई भी हुई.
विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में , अनुसूचित जाति के छात्रावासो में सवर्ण मोर्चा के छात्र जबरन घुसकर निरीह छात्रों की पिटाई करते थे. हिंदी बेल्ट के क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांशतः अनुसूचित जाति समुदाय की बस्तियां और लोग जातीय हिंसा के शिकार हुए.
अनुसूचित जाति के लोगो को कार्यालयों में, कार्यस्थलों पर और चाय की दुकानों पर खूब गालियाँ खानी पड़ती थी. सहकर्मियों से उपेक्षा का दंश झेलना पड़ता था. यही नही जगह जगह पर भारत रत्न बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर की भी मूर्तियां टूटने लगी.
कारण इस फसाद की जड़ में लोग कही न कही भारतीय संविधान और बाबा साहेब भी मान रहे थे. यही नही वी पी सिंह की सरकार ने 1990 में ही बाबा साहेब अंबेडकर को भारत के सर्वोच्च सम्मान " भारत -रत्न " के अलंकरण से विभूषित किया था.
समाज की वर्णवादी व्यवस्था में पिछड़ों का दुःख दलितों के दुःख जैसा ही है. यह बात अलग है कि वक़्त के साथ रह रह कर इनका दर्द गायब हो जाता है. इस घोर संकट में भी समान दुखभागी होने के बाद भी एक मंच पर आने को तैयार नही होते है.
मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने की घोषणा मात्र पर ही विरोधस्वरूप अनुसूचित जाति के लोगो के साथ हुआ जोर जुल्म और अत्याचार ने जोर पकड़ लिया. यह जुल्म इस कहावत को चरितार्थ करता है कि " खेत खाये गदहा - मार खाये जोलहा ".
मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू करने के ख़िलाफ़ 'अखिल भारतीय आरक्षण विरोधी मोर्चा ' ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट कोर्ट की नौ सदस्यीय बेंच ने सुनवाई के उपरांत 16 नवम्बर 1992 को पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के पक्ष में अपना फैसला सुनाया और वी पी सिंह सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी.
यही नही इसी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50% निर्धारित कर दी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ ही पिछड़े वर्ग के लिए केंद्र सरकार ने 27% आरक्षण की अधिसूचना जारी कर दी. परन्तु इसके पीछे मिले दंश को दलित समाज भुला नही सकता है.
सवर्ण मोर्चा अपने इस अभियान में नाकाम दिख रहा था.
अपना उल्लू सीधा नही होता देख राजनीति ने विरोध की दिशा ही बदल दी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक समुदाय भीतर ही भीतर खूब सुलग रहा था. कोई उपाय नही होता देख सत्ता का घटक दल बीजेपी ने सरकार से किनारा करना शुरू कर दिया. मंडल बनाम कमंडल की राजनीति की शुरुआत हो गयी.
तत्समय लालकृष्ण आडवाणी जी धर्म रथ लेकर देश की यात्रा पर निकल पड़े. लोग रामधुन पर नाचने लगे. रथ के बिहार में प्रवेश करते ही लालू यादव ने रथ के घोड़े को लगाम लगाई और परिणाम स्वरूप आडवाणी जी की गिरफ्तारी हुई। वी पी सिंह की सरकार से बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया। वी पी सिंह की सरकार गिर गयी.
भारत की पिछड़ी जातियों के जीवन मे सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक परिवर्तन लाने वाले वी पी सिंह जी को दलितों और पिछड़ों के नेताओ ने वह सम्मान नही दिया ,जिसके ये हकदार थे. आज की तारीख में बहुतेरे पिछड़े समुदाय के नेता शासन-सत्ता की धुरी में है. लेकिन वी पी सिंह जैसा साहसिक कदम उठाने और वंचितों को न्याय दिलाने का साहस उनमें नही है.
विडंबना है कि विभिन्न खेमो में बंटा हुआ दलित और पिछड़ा समाज अपने जाति के नेता का पिछलग्गू बना हुआ है जो बड़े आराम से जाति के वोटो की खरीद फ़रोख़्त चुनाव में करते है। ध्यान रहे कि पिछड़े समाज के बल पर टिकी हुई यह राजनीति और हो रहा धर्म का धंधा इनकी अज्ञानता और मूर्खता पर टिका हुआ है.
यूपी के पूर्वांचल से सामाजिक न्याय के पुराधाओ के जाने से पिछड़े समाज के नेताओ की उन्नति और पिछड़े समाज की हर तरह से दुर्गति हो रही है. अब दूसरा वी पी सिंह नही आने वाला ,मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने वाला यह मंडल मसीहा वक़्त के साथ भुला दिया गया है.