हिंदू महिलाओं ने 24 घंटे के लिए रखा निर्जला व्रत

पुत्र के दीर्घायु के लिए की जिउतिया पूजा, धागा और सोना-चांदी से बने जितिया पहनी.

जीवित्पुत्रिका पर्व। देश भर की हिन्दू महिलाओं ने अपने अपने पुत्रों के सुख समृद्धि और दीर्घायु के लिए रविवार को 24 घंटे का निर्जला व्रत रखी और शाम को गाजा बाजा के साथ बांस की डलिया में मिष्ठान, पकवान, फल, फूल और पूजन सामग्री सजाकर तालाब और नदी में स्नान कर भगवान की आराधना की. देर शाम समूहों में बैठकर जिउतिया की कथा सुनी. अपने पुत्र और पुत्री के सुखद भविष्य को लेकर धागा और सोना-चांदी से बने जितिया पहनी.

व्रत करने वाली महिला प्रभा, सुनैना, चिन्ता, खारा, ज़िंसा, बुधा ने बताया कि हिंदू धर्म में साल भर व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं. सभी व्रत-त्योहारों को मनाने की परंपरा अलग-अलग होती है. साथ ही सभी त्योहारों के धार्मिक महत्व व मान्यता भी अलग-अलग हैं. इनमें से एक जितिया पर्व है, जिसे जीवित्पुत्रिका भी कहा जाता है. यह त्योहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल के इलाके में ज्यादा प्रचलित है. जितिया में माताएं अपने पुत्रों के बेहतर स्वास्थ्य, सुखमय जीवन और लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखा जाता है.

जितिया व्रत 2025 की तिथि और महत्व
खगड़िया सहित बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल और मिथिला क्षेत्र में संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए किए जाने वाला जितिया व्रत इस वर्ष 14 सितंबर 2025 को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया. हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ा है.

व्रत का नाम और धार्मिक महत्व
अरविंद त्रिपाठी ने बताया कि जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत' भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन और माता पार्वती की पूजा करती हैं. यह व्रत माताओं द्वारा अपने पुत्रों की दीर्घायु और रक्षा के लिए किया जाता है.

व्रत की प्रक्रिया और तिथियां
इस वर्ष 13 सितंबर के दिन महिलाएं स्नान कर शुद्ध भोजन करती हैं. उसके बाद सप्तमी तिथि को उपवास शुरू होता है और अष्टमी तिथि (14 सितंबर) को पूरा दिन निर्जला व्रत रखा जाता है. रात्रि में व्रत कथा सुनकर पूजा की जाती है. नवमी तिथि (15 सितंबर) को व्रत का पारण किया जाएगा.

धार्मिक कथा और आस्था
मान्यता के अनुसार, राजा जीमूतवाहन ने अपने जीवन का बलिदान देकर नागवंश के पुत्रों की रक्षा की थी. तभी से माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु और संकटों से सुरक्षा के लिए यह व्रत करती आ रही हैं. यह व्रत मातृ शक्ति और बलिदान का प्रतीक है.

"यह व्रत प्रदोष व्यापिनी तिथि में किया जाता है. महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए प्रदोष काल में निर्जला व्रत रखती हैं. इस बार जितिया व्रत की तिथि और समय बहुत अनुकूल है, जिससे यह व्रत करना अधिक सरल होगा"- जामवंत तिवारी 

इस वर्ष का विशेष संयोग
इस वर्ष महिलाएं 13 तारीख को नहाय-खाय करेंगी और रात्रि में सप्तमी रहने तक विशेष भोजन करेंगी. फिर 14 तारीख सूर्योदय से लेकर 15 तारीख के सूर्योदय (सुबह 6:36 बजे) तक निर्जला व्रत रखेंगी. 15 तारीख को 6:36 AM पर अष्टमी समाप्त होगी, जिसके बाद महिलाएं खीरा, अंकुरित चना या दूध के साथ व्रत खोल सकती हैं.

हाथी पेट और अगले वर्ष की स्थिति
यह व्रत इसलिए भी विशेष है क्योंकि तिथि सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक पूर्ण रूप से मिल रही है. मान्यता है कि 'हाथी पेट' जब तिथि में आता है, तो वह व्रत शुद्ध और फलदायी होता है. हालांकि, अगले वर्ष मलमास होने के कारण नई महिलाएं जितिया व्रत शुरू नहीं कर सकेंगी. इसलिए इस वर्ष व्रत शुरू करने का उत्तम अवसर है.

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