प्रकृति भारत के किसानों पर मौसम का बरपा रही कहर- पिंटू पाल

बेमौसम बारिश ने किसानों की बढ़ाई धुकधुकी, फसल भारी नुकसान होने की आशंका

 चंदौली। प्रकृति इस वर्ष भारत के किसानों पर मौसम का कहर बरपा रही है. कहीं भारी बारिश, बाढ़ और चक्रवाती तूफान से फसलों का नुकसान हुआ, तो कहीं सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा है. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में यह बदलाव अब आम बात हो गई है, जिससे किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं.

किसान नेता पिंटू पाल ने बताया कि कुछ दिनों पूर्व पानी पानी को हम लोग तरस रहे थे. धानों की रोपाई के लिए मशीन का सहारा लेना पड़ा था. पिछले तीन दिनों से हो रही बारिश और तेज हवाएं ने किसानों की धुकधुकी बढ़ा दी है. फसल भारी नुकसान होने की आशंका है.  

कहीं फसल पक कर कटाई करने योग्य हो गई हैं तो कहीं कटाई चल रही है. खेतों में काफी जल जमाव के कारण फसलें सड़ रही हैं, मिट्टी में फंगस लग रहा है और कई जगह तो फसलें जमीन पर पसर गई हैं, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा है.

तेज हवाओं और बारिश से धान और गन्ने की फसलें बिछ गई हैं, जिससे उपज खराब हो रही है. जलभराव के कारण टमाटर, मिर्च और गोभी जैसी सब्जियों की जड़ें सड़ रही हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो रहे हैं. किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि लागत निकालना मुश्किल हो गया है. बारिश से फसल में फफूंदी लगने का खतरा है, जिससे मंडी में दाम कम मिलेंगे. फसल की बर्बादी से किसानों में मानसिक और आर्थिक तनाव बढ़ा है.

अत्यधिक बारिश और बाढ़ से नुकसान
पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाढ़ और लगातार बारिश के कारण खरीफ फसलें बर्बाद हो गईं, जिससे कृषि उत्पादन पर दबाव पड़ा. पंजाब में अगस्त में सामान्य से 74% अधिक बारिश हुई, जिससे 70,000 हेक्टेयर से ज़्यादा खेत जलमग्न हो गए.

सूखा और कम बारिश की स्थिति
अगस्त 2025: मॉनसून की शुरुआत में सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद, भारत के लगभग 19% हिस्से में सूखे जैसी स्थिति बनी रही. कई जिलों में सूखे की 'अत्यधिक' और 'असाधारण' स्थिति देखी गई. पूर्वी उत्तर प्रदेश का देवरिया जिला इस मॉनसून में देश का सबसे सूखा जिला रहा, जहाँ सामान्य से 87% कम बारिश दर्ज की गई. यह लगातार तीसरे साल हुआ है, जब इस क्षेत्र में कम बारिश हुई है. मॉनसून के समय और पैटर्न में बदलाव से बुवाई और कटाई के कार्यक्रम प्रभावित हो रहे हैं.

उत्पादकता में कमी: बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और कीटों के प्रकोप से फसल की पैदावार में कमी आ रही है. अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन से 2050 तक कुछ फसलों की पैदावार में 40% तक की कमी आ सकती है.
आजीविका पर संकट: फसल खराब होने से किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर संकट बढ़ रहा है। 

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