चंदौली के धीना थाना क्षेत्र के कमालपुर कस्बे में स्थित सेंट जोसेफ स्कूल एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह नई उपलब्धियां या शैक्षिक उत्कृष्टता नहीं, बल्कि एक लंबा-चौड़ा 'एनुअल फंक्शन' है, जो सुबह 9 बजे शुरू होकर रात 11 बजे तक खिंच गया। क्या यह स्कूल का कार्यक्रम था या 12 घंटे का सांस्कृतिक मैराथन?
कल्पना कीजिए—छोटे-छोटे बच्चे, जो रोजाना 6-7 घंटे की कक्षाओं से ही थककर चूर हो जाते हैं, उन्हें पूरे दिन स्टेज पर नचाया गया। डांस, नाटक, गीत-संगीत—सब कुछ। सूत्र बताते हैं कि रिहर्सल्स हफ्तों से चल रही थीं, मानो किताबें भूलकर अब स्टेज ही सबक बन गया हो। होमवर्क की जगह रिहर्सल, और पढ़ाई की जगह स्पॉटलाइट! एक स्थानीय अभिभावक ने बताया, "मेरा 8 साल का बेटा सुबह 8 बजे स्कूल गया और आधी रात को लौटा। बच्चे थके-हारे थे, लेकिन स्कूल की 'ग्रैंड सफलता' हो गई।"
अभिभावकों का लंबा इंतजार और सुरक्षा का सवाल
स्कूल गेट पर सैकड़ों माता-पिता घंटों खड़े रहे, मोबाइल पर अपडेट का इंतजार करते। कार्यक्रम खत्म होने के बाद बच्चे बिखर गए—कई रात 12 बजे के बाद घर पहुंचे, तो दूर-दराज के गांवों के बच्चे सुबह 2 बजे तक। कमालपुर जैसे ग्रामीण इलाके में रात के अंधेरे में सड़कें सुनसान होती हैं। अगर रास्ते में कोई दुर्घटना हो जाती—ट्रक से टक्कर, चोरी या फिर कोई अनहोनी—तो जिम्मेदारी कौन लेता? स्कूल ने बसों या वाहनों की व्यवस्था की थी या 'कार्यक्रम समाप्त, जिम्मेदारी समाप्त'? स्थानीय राहुल पाण्डेय कहते हैं, "यह लापरवाही है। बच्चे स्कूल के जिम्मे होते हैं, रात भर नहीं भेज सकते।" चंदन, राजेश सिंह और अरबिंद सिंह जैसे ग्रामीणों ने भी इसे प्रबंधन की 'बड़ी भूल' बताया।
प्रिंसिपल और शिक्षा अधिकारी क्या कहते हैं?
स्कूल प्रिंसिपल नेल्सन कवि का स्पष्ट बयान है: "कार्यक्रम के लिए सिर्फ रात 10 बजे तक की अनुमति थी। देरी अप्रत्याशित हुई।" वहीं, खंड शिक्षा अधिकारी अवधेश नारायण सिंह ने कहा, "मुझे इसकी पूर्व जानकारी नहीं थी। अगर अनुमति से ज्यादा समय चला, तो निश्चित जांच होगी और उचित कार्रवाई।" यह पहला मामला नहीं—पिछले साल भी इसी स्कूल का एक फंक्शन विवादों में रहा था, जब बच्चों को देर रात भेजा गया था।
शिक्षा का मंदिर या इवेंट मैनेजमेंट का अड्डा?
सवाल गंभीर है: क्या स्कूल अब 'शिक्षा के मंदिर' से 'स्टेज शो के केंद्र' में बदल रहे हैं? जहां बच्चों की नींद, स्वास्थ्य और सुरक्षा से ज्यादा 'ग्रैंड इवेंट' को तरजीह मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम 4-5 घंटे से ज्यादा नहीं होने चाहिए, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां परिवहन सीमित है। कमालपुर जैसे कस्बे में, जहां ज्यादातर बच्चे साइकिल या पैदल आते-जाते हैं, यह जोखिम दोगुना हो जाता है। अभिभावक जागें और प्रशासन सतर्क हो। अन्यथा, अगला 'एनुअल फंक्शन' सिर्फ सुर्खियां नहीं, बल्कि दुखद खबर बन सकता है।
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