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समाधान दिवस आयोजित करने के बजाय प्रदर्शनकारियों की घेराबंदी में जुटी रही चंदौली पुलिस

फिर भी रोकने की हर कोशिश नाकाम, भीम आर्मी-आजाद समाज पार्टी सहित हजारों लोग पहुंचे कलेक्ट्रेट

चंदौली। उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में शनिवार का दिन पुलिस-प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनातनी, घेराबंदी और ज्ञापन सौंपने की जद्दोजहद के नाम रहा। भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी, छात्र-युवा और बेरोजगार संगठनों के कार्यकर्ताओं को जिला मुख्यालय तक पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस ने कई जगह बैरिकेडिंग की, लेकिन बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी फिर भी मुख्यालय तक पहुंच गए।

पुलिस-प्रशासन की घेराबंदी
जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सभी जनपद के सभी थानों पर शनिवार को समाधान दिवस आयोजित करने के बजाय पुलिस प्रशासन का बड़ा हिस्सा प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगा रहा। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं को घरों में ही रोकने की कोशिश की गई और चट्टी-चौराहों पर उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया। इसके बावजूद भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी, छात्र-छात्राओं, युवाओं और बेरोजगारों का हुजूम जिला मुख्यालय पहुंच गया।

मुख्यालय पर रोका गया मार्च
चंदौली में प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सीधे जिलाधिकारी को देने पर अड़े रहे। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए सख्त पहरा लगाया और बैरिकेडिंग के जरिए रास्ता बंद कर दिया। इससे मौके पर तनावपूर्ण स्थिति बन गई और काफी देर तक प्रशासनिक मशक्कत चलती रही। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि उनकी आवाज दबाने की कोशिश की गई, जबकि वे शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना चाहते थे।

एडीएम ने लिया ज्ञापन
बाद में अपर जिलाधिकारी धरना स्थल पर पहुंचे और प्रदर्शनकारियों से ज्ञापन प्राप्त किया। इसके बाद विरोध कर रहे लोगों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई और अपना विरोध दर्ज कराया। ज्ञापन सौंपे जाने के बाद प्रदर्शनकारी वापस लौट गए, लेकिन इस दौरान पूरे घटनाक्रम ने जिला प्रशासन की कार्यशैली और कानून-व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए।

प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
कार्यकर्ताओं का कहना था कि वे अपनी मांगों को सीधे जिला प्रशासन तक पहुंचाना चाहते थे, लेकिन उन्हें रास्ते में रोका गया। प्रदर्शन में शामिल छात्र-युवा और बेरोजगार संगठनों ने भी इस रवैये पर आपत्ति जताई और कहा कि प्रशासन जनसमस्याओं को सुनने के बजाय रोक-टोक की रणनीति अपना रहा है। कई प्रदर्शनकारियों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया।

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