Hot Posts

6/recent/ticker-posts

चंदौली: कानूनी प्रक्रिया के बिना बेदखली और महिलाओं पर लाठीचार्ज गंभीर, दोषियों पर हो कार्रवाई : अजय राय

गिरफ्तार महिलाओं समेत सभी को न्यायिक राहत देने और वनाधिकार दावों का पारदर्शी निस्तारण कराने की मांग 

नौगढ़, चंदौली। भरदूंआ गांव में वनाधिकार कानून के तहत भूमि पर दावों और कथित बेदखली की कार्रवाई को लेकर विवाद गहरा गया है। दलित और मांझी समुदाय के परिवारों की बेदखली तथा महिलाओं पर कथित लाठीचार्ज और गिरफ्तारी के मामले की जानकारी लेने के लिए एआईपीएफ के राष्ट्रीय समिति सदस्य अजय राय और रहीमुद्दीन के नेतृत्व में पांच सदस्यीय टीम गांव पहुंची। टीम ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर घटनाक्रम की जानकारी ली और उनकी समस्याएं सुनीं।

अजय राय ने कहा कि बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए दलित और मांझी परिवारों को बेदखल करना तथा महिलाओं पर लाठीचार्ज करना गंभीर मामला है। वनाधिकार कानून के तहत ग्रामीणों द्वारा किए गए दावों का नियमानुसार निस्तारण किया जाना चाहिए। यदि किसी परिवार का दावा खारिज किया गया है तो उसे खारिज किए जाने का कारण बताते हुए कानून के तहत उपलब्ध अपील और निगरानी समिति के समक्ष जाने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रशासन और वन विभाग को कानून का पालन करते हुए ग्रामीणों के दावों की निष्पक्ष सुनवाई करनी चाहिए। दावों का निस्तारण किए बिना किसी परिवार को बेदखल करने की कार्रवाई से विवाद और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि वनाधिकार कानून के तहत पात्र परिवारों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

महिलाओं पर लाठीचार्ज की जांच की मांग

अजय राय ने महिलाओं पर कथित लाठीचार्ज को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि कार्रवाई के दौरान यदि महिलाओं के साथ नियमों के विपरीत बल प्रयोग हुआ है तो इसकी जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

उन्होंने गिरफ्तार महिलाओं सहित सभी लोगों को न्यायिक राहत उपलब्ध कराने की भी मांग की। उनका कहना है कि गिरफ्तार लोगों के मामलों की निष्पक्ष समीक्षा हो और कानून के अनुसार उन्हें राहत दी जाए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए।

1973 में जमीन लिए जाने का भी उठाया मुद्दा

प्रतिनिधिमंडल के सामने ग्रामीणों ने वर्ष 1973 में भेड़ा फार्म के लिए किसानों की जमीन लिए जाने का मामला भी उठाया। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन लिए जाने के बाद विस्थापित किसानों को जमीन उपलब्ध कराने और राजस्व अभिलेखों में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। ग्रामीणों के अनुसार यदि उस समय जमीन देने के बाद नामांतरण नहीं किया गया तो यह प्रशासनिक स्तर की चूक है।

अजय राय ने कहा कि पुराने भूमि विवाद की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राजस्व और वन विभाग के अभिलेखों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि वर्ष 1973 में किन किसानों की जमीन ली गई थी, उन्हें क्या मुआवजा या वैकल्पिक भूमि दी गई और बाद में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई या नहीं। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा ग्रामीणों को नहीं भुगतना चाहिए।

राजनीतिक दबाव में कार्रवाई का आरोप

पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि दलित और मांझी समुदाय के लोगों के खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक दबाव में की गई। ग्रामीणों का कहना है कि भाजपा नेताओं के इशारे पर उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

एआईपीएफ नेताओं ने कहा कि वनाधिकार कानून के तहत किए गए दावों का पारदर्शी तरीके से निस्तारण होना चाहिए। प्रशासन को पहले दावों और संबंधित दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए तथा दावा खारिज होने की स्थिति में संबंधित परिवार को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपील अथवा निगरानी समिति के समक्ष जाने का अवसर देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वन विभाग और जिला प्रशासन को उत्पीड़न के बजाय कानून के तहत दावों का निस्तारण करना चाहिए। ग्रामीणों के साथ संवाद स्थापित कर समस्या का समाधान निकाला जाए, ताकि क्षेत्र में तनाव की स्थिति समाप्त हो सके।

प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि भरदूंआ प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, महिलाओं पर लाठीचार्ज के आरोपों की जांच हो, दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की जाए और गिरफ्तार महिलाओं समेत सभी लोगों को कानूनी राहत उपलब्ध कराई जाए। साथ ही वनाधिकार कानून के तहत लंबित सभी दावों का नियमानुसार और पारदर्शी तरीके से निस्तारण किया जाए।