नई दिल्ली। भारत के सामाजिक इतिहास को समझने के लिए केवल आज की परिस्थितियों को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को भी समझना होगा, जिन्होंने समाज में धन, भूमि, शिक्षा, सत्ता और संसाधनों के वितरण को प्रभावित किया। ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों ने विभिन्न भू-राजस्व और जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन को मजबूत किया। इस दौरान पहले से सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले कई वर्ग औपनिवेशिक शासन के सहयोगी बने। परिणामस्वरूप भूमि, संपत्ति और स्थानीय सत्ता पर कुछ प्रभावशाली समूहों की पकड़ कई क्षेत्रों में और मजबूत हुई।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र और संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और न्याय को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया। संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि सदियों से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित समुदायों को केवल कानूनी समानता दे देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें वास्तविक अवसर उपलब्ध कराने के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता होगी। इसी सोच के तहत सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था विकसित हुई।
आजादी के बाद भूमि सुधारों के माध्यम से जमींदारी उन्मूलन, भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध कराने और भूमि के अधिक न्यायपूर्ण वितरण की कोशिश की गई। कई राज्यों में महत्वपूर्ण सुधार हुए, लेकिन इन सुधारों का प्रभाव देश के हर हिस्से में समान नहीं रहा। प्रशासनिक कमजोरियों, कानूनी विवादों, भूमि अभिलेखों की समस्याओं और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्गों के प्रतिरोध के कारण भूमि सुधार अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सके।
भूमि और संसाधनों की असमानता ने कई क्षेत्रों में सामाजिक तनाव को जन्म दिया। इसी व्यापक सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में आगे चलकर विभिन्न उग्र सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को भी जमीन मिली, जिनमें नक्सल आंदोलन प्रमुख उदाहरणों में शामिल है। हालांकि ऐसे आंदोलनों के अनेक राजनीतिक, आर्थिक और स्थानीय कारण रहे हैं, लेकिन भूमि और संसाधनों की असमानता को उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के महत्वपूर्ण तत्वों में माना जाता है।
आरक्षण का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, प्रतिनिधित्व भी
भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और सरकारी सेवाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएं कीं। इसका मूल उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को बराबरी के अवसर उपलब्ध कराना और उन्हें शासन तथा संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाना था।
बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण लागू किया गया। केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में भी OBC आरक्षण की व्यवस्था विकसित हुई।
इसके साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए EWS आरक्षण की व्यवस्था भी अस्तित्व में आई। इससे यह बहस और महत्वपूर्ण हो गई है कि भारत में आरक्षण और प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था का समय-समय पर आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए।
सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत आंकड़ों की आवश्यकता
सामाजिक न्याय की नीतियां तभी प्रभावी ढंग से बनाई जा सकती हैं, जब सरकार और समाज के पास विश्वसनीय आंकड़े हों। देश में विभिन्न सामाजिक समूहों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है, कितने लोगों के पास भूमि है, कितने परिवार भूमिहीन हैं, शिक्षा में किसकी कितनी भागीदारी है, सरकारी सेवाओं में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व कितना है और आर्थिक संसाधनों का वितरण किस प्रकार है—इन सवालों के स्पष्ट आंकड़े आवश्यक हैं।
इसीलिए सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत आंकड़ों की मांग को व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आंकड़े किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं होते। उनका उद्देश्य यह पता लगाना होना चाहिए कि विकास की प्रक्रिया में कौन पीछे है, किन क्षेत्रों में असमानता अधिक है और सरकारी नीतियों का लाभ किन वर्गों तक कितना पहुंच रहा है। जब तक व्यापक और विश्वसनीय आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक सामाजिक न्याय की नीतियों के प्रभाव का पूर्ण मूल्यांकन कठिन बना रहेगा।
‘जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी’ का सवाल
सामाजिक न्याय की बहस का एक प्रमुख नारा रहा है—‘जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी।’ इस विचार का मूल प्रश्न प्रतिनिधित्व की समानता से जुड़ा है। यदि किसी समुदाय की आबादी बड़ी है, लेकिन महत्वपूर्ण संस्थाओं और निर्णय लेने वाली व्यवस्थाओं में उसका प्रतिनिधित्व बेहद कम है, तो उस असमानता का अध्ययन किया जाना चाहिए।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सवाल भी इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा है। स्थानीय निकायों में महिलाओं के आरक्षण ने राजनीतिक भागीदारी का रास्ता व्यापक किया है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए भी संवैधानिक स्तर पर महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन व्यवस्थाओं का प्रभाव जमीन पर कितना दिखाई देता है, इसका लगातार मूल्यांकन किया जाए।
इसी प्रकार OBC सहित विभिन्न सामाजिक समूहों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नीति निर्माण में उनकी भागीदारी और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी उपस्थिति पर भी गंभीर चर्चा आवश्यक है।
न्यायपालिका और प्रशासन में प्रतिनिधित्व
सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित विषय नहीं है। देश की न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षा, शोध संस्थानों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी भी लोकतंत्र की व्यापक तस्वीर को प्रभावित करती है।
उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसी तरह पदोन्नति में आरक्षण, सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों की सामाजिक संरचना और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर भी आंकड़ों के आधार पर विमर्श होना चाहिए।
लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान करने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यह भी है कि समाज के अलग-अलग वर्गों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी बात रखने और प्रभावी भागीदारी का अवसर मिले।
आर्थिक विकास में भागीदारी के साथ निर्णय लेने की शक्ति भी जरूरी
आज भारतीय अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सामाजिक न्याय की चर्चा केवल सरकारी क्षेत्र तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। निजी क्षेत्र में रोजगार, प्रबंधन, उद्यमिता, बोर्ड स्तर और निर्णय लेने वाले पदों पर सामाजिक विविधता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों के लोगों को केवल श्रम और मजदूरी तक सीमित रहना लोकतांत्रिक समानता की व्यापक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उन्हें शिक्षा, उद्यमिता, प्रबंधन और नेतृत्व के अवसर भी मिलने चाहिए।
सरकारी ठेकों, सार्वजनिक खरीद और आर्थिक योजनाओं में छोटे उद्यमियों तथा वंचित समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के उपायों पर भी गंभीर विचार किया जा सकता है। इससे आर्थिक विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
मीडिया में भी सामाजिक विविधता जरूरी
मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। समाचार माध्यम समाज की समस्याओं को सामने लाते हैं और जनता तथा सत्ता के बीच संवाद का माध्यम बनते हैं। ऐसे में मीडिया संस्थानों में भी सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण है।
यदि किसी समाज के बड़े हिस्से की आवाज मीडिया के निर्णय लेने वाले स्तरों पर पर्याप्त रूप से मौजूद नहीं है, तो उसके मुद्दों की प्राथमिकता और प्रस्तुति प्रभावित हो सकती है। इसलिए मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता, संपादन, प्रबंधन और निर्णय लेने वाले पदों पर विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ाने पर भी व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
संघर्ष अधिकार छीनने का नहीं, बराबरी का होना चाहिए
सामाजिक न्याय की लड़ाई को किसी दूसरे वर्ग के अधिकार छीनने की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समान अवसर, सम्मान और प्रभावी भागीदारी मिल सके।
भारत का संविधान समानता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय की भी बात करता है। इसलिए आज जरूरत भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर आंकड़ों, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संवाद के आधार पर नीतियां तय करने की है।
धन, धरती, शिक्षा, रोजगार, सत्ता, प्रशासन, न्यायपालिका, राजनीति, मीडिया और आर्थिक संस्थानों में भागीदारी का सवाल अंततः लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। सामाजिक न्याय तभी वास्तविक रूप ले सकता है, जब विकास के अवसरों के साथ निर्णय लेने की शक्ति में भी व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो।
एक न्यायपूर्ण समाज का लक्ष्य किसी एक वर्ग को ऊपर उठाकर दूसरे को नीचे करना नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक असमानताओं को कम करना होना चाहिए, जिन्होंने समाज के बड़े हिस्से को लंबे समय तक अवसरों से दूर रखा।
वास्तविक सामाजिक न्याय की कसौटी यही है कि देश की प्रगति का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे और राष्ट्र के महत्वपूर्ण निर्णयों में हर वर्ग की आवाज प्रभावी रूप से सुनी जाए।