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राज्यपाल के कार्यकाल और KGMU कुलपति की पुनर्नियुक्ति पर स्वामी प्रसाद मौर्य ने उठाए सवाल

लखनऊ। अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश में संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों, कार्यकाल और पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए पोस्ट में राज्यपाल के कार्यकाल को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्यपाल का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है। ऐसे में यदि पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी कोई राज्यपाल लंबे समय तक पद पर बना रहता है और उसके कार्यकाल विस्तार अथवा पुनर्नियुक्ति से संबंधित स्पष्ट आदेश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष संवैधानिक जांच होनी चाहिए।

मौर्य ने कहा कि राज्यपाल का पद संविधान के तहत अत्यंत महत्वपूर्ण और गरिमापूर्ण संवैधानिक पद है। इस पद पर नियुक्ति, कार्यकाल और पद पर बने रहने की प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार की अस्पष्टता लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित नहीं मानी जा सकती। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता और स्पष्टता बेहद जरूरी है, ताकि जनता के बीच किसी प्रकार का भ्रम या संदेह पैदा न हो।

उन्होंने कहा कि यदि किसी राज्यपाल का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद भी पद पर बने रहना जारी है तो उससे संबंधित आदेश, अधिसूचना अथवा संवैधानिक प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि पद पर बने रहने के पीछे संवैधानिक और कानूनी आधार क्या है। मौर्य के मुताबिक यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और उनकी गरिमा से जुड़ा हुआ विषय है।

KGMU कुलपति की पुनर्नियुक्ति पर भी सवाल

इसी क्रम में स्वामी प्रसाद मौर्य ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) की कुलपति की पुनर्नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुलपति पर भ्रष्टाचार और आरक्षण संबंधी नियमों की अनदेखी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ऐसे आरोपों के बावजूद यदि उन्हें दोबारा नियुक्ति दी गई है तो नियुक्ति की प्रक्रिया, निर्णय के आधार और संबंधित नियमों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

मौर्य ने कहा कि किसी विश्वविद्यालय में कुलपति जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति केवल व्यक्ति की योग्यता तक सीमित विषय नहीं है। नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित नियमों, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का पालन भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जांच के बाद ही नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति को लेकर निर्णय लिया जाना चाहिए।

SC, ST और OBC के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया

अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय संविधान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग सहित वंचित एवं पिछड़े वर्गों को समान अवसर और प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है। ऐसे में सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों में यदि निर्धारित नियमों की अनदेखी होती है तो इसका असर सामाजिक न्याय की व्यवस्था पर पड़ता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब नियुक्तियों में नियम और संविधान का पालन नहीं होगा तो SC, ST और OBC समाज को बराबरी का प्रतिनिधित्व और न्याय कैसे मिलेगा? मौर्य ने कहा कि सामाजिक न्याय केवल भाषणों और राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका प्रभाव सरकारी संस्थानों और नियुक्तियों की प्रक्रिया में भी दिखाई देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संविधान ने समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान किए हैं। इसलिए इन प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं होने या नियमों की अनदेखी के आरोप लगने पर संबंधित दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।

निष्पक्ष समीक्षा की मांग

स्वामी प्रसाद मौर्य ने राज्यपाल के कार्यकाल तथा KGMU कुलपति की पुनर्नियुक्ति से जुड़े सभी दस्तावेजों और निर्णयों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा कि संबंधित आदेश, अधिसूचना और नियुक्ति प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि सभी निर्णय निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।

उन्होंने कहा कि यदि समीक्षा के दौरान किसी स्तर पर नियमों अथवा संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन पाया जाता है तो इसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। उनके मुताबिक लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास तभी मजबूत रह सकता है, जब नियुक्तियों और कार्यकाल से जुड़े निर्णय स्पष्ट, पारदर्शी और नियमसम्मत हों।

मौर्य ने कहा कि संविधान सर्वोपरि है और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के कार्यकाल से लेकर विश्वविद्यालयों में उच्च पदों पर नियुक्तियों तक प्रत्येक मामले में निर्धारित नियमों और संवैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट रूप से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

उन्होंने दोहराया कि संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और पुनर्नियुक्ति को लेकर उठने वाले सवालों को नजरअंदाज करने के बजाय उनका तथ्यात्मक और निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। इससे न केवल संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता मजबूत होगी, बल्कि जनता के बीच भी व्यवस्था के प्रति विश्वास कायम रहेगा।

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