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लोक आस्था का महापर्व छठ का महत्व और विशेषताएं जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

छठ पूजा
17 नवंबर से लोक आस्था का महापर्व छठ शुरू हो रहा है। इस महोत्सव का समापन 20 नवंबर को होगा । चार दिन तक चलने वाले छठ पूजा के पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन साध्य अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य देते हुए समापन होता है l

छठ पूजा माता छठी की पूजा हेतु मनाई जाती है जो की वेदों के अनुसार भगवान सूर्यनारायण की पत्नी उषा हैं ! इसलिए छठ पूजा के दिन माँ छठी के साथ-साथ उनके पति सूर्य देव की भी पूजा का विशेष विधान होता है ! छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाई जाती है, चैती छठ पूजा चैत्र मास में आती है और कार्तिक छठ पूजा जो कार्तिक मास में षष्ठी तिथि को मनाई जाती है ! यह व्रत अत्यंत कठिन है और इसमें पूर्ण तन और मन को साधना होता है इसलिए इसे हठयोग भी कहा जाता है !

छठ पूजा की विशेषता :-

छठ पूजा का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है ! यह त्यौहार मूल रूप से बिहार, झारखण्ड, नेपाल तथा उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है ! यह पर्व चार दिनों तक चलता है, जो की दिवाली की अमावस्या के बाद मनाया जाता है ! मुख्यतः भैया दूज के तीसरे दिन से यह व्रत शुरू होता है, तथा शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन मनाये जाने के कारण इसका नाम छठ पूजा पड़ा ! इस दिन व्रत रखने वाले लोग 36 घंटों तक उपवास रखते हैं !

यह व्रत ज़्यादातर स्त्रियां ही रखतीं हैं किन्तु आजकल पुरुष भी इसे अत्यधिक श्रद्धा के साथ मनाते हैं तथा व्रत रखते हैं ! यह व्रत परिवार की सुरक्षा तथा खुशहाली के लिए रखा जाता है, मान्यता है की छठी माई संतानों की रक्षा करके उनको दीर्घायु प्रदान करती हैं !


छठ पूजा की व्रत विधि :-

यह महान पर्व चार दिवसीय होता है, मुख्यतः बिहार में इसका एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है ! इन चार दिनों में व्रत तथा पूजा की विधि इस प्रकार है :-

1. नहाय - खाय - पहले दिन यह विधि की जाती है, इस दिन सूर्योदय से पूर्व पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है ! स्नान के बाद किया जाता है और भोजन में कद्दू की सब्जी तथा दाल चावल ही खाया जाता है !

छठ पूजा कैलेंडर 2023

छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय 17 नवंबर, दिन शुक्रवार
छठ पूजा का दूसरा दिन खरना (लोहंडा) 18 नवंबर, दिन शनिवार
छठ पूजा का तीसरा दिन छठ पूजा, संध्या अर्घ्य 19 नवंबर, दिन रविवार
छठ पूजा का चौथा दिन उगते सूर्य को अर्घ्य, पारण 20 नवंबर, दिन सोमवार

नहाए-खाय से छठ महापर्व प्रारंभ

यह व्रत बहुत ही कठिन माना जाता है। इसमें 36 घंटों तक कठिन नियमों का पालन करते हुए इस व्रत को रख जाता है। छठ पूजा का व्रत रखने वाले लोग चौबीस घंटो से अधिक समय तक निर्जल उपवास रखते हैं। इस पर्व का मुख्य व्रत षष्ठी तिथि को रखा जाता है, लेकिन छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से हो जाती है, जिसका समापन सप्तमी तिथि को प्रातः सूर्योदय के समय अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है।

Chhath Puja: नहाय-खाय से लेकर उषा अर्घ्य तक, जानिए चार दिन तक चलने वाले छठ महापर्व में किस दिन क्या होता है

खरना 2023 की तारीख

खरना यानी लोहंडा छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। इस साल खरना 18 नवंबर को है। इस दिन का सूर्योदय सुबह 06 बजकर 46 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 26 मिनट पर होगा।

छठ पूजा 2023 पर संध्या अर्घ्य का समय

छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य का होता है। इस दिन छठ पर्व की मुख्य पूजा की जाती है। तीसरे दिन व्रती और उनके परिवार के लोग घाट पर आते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य 19 नवंबर को दिया जाएगा। 19 नवंबर को सूर्यास्त शाम 05 बजकर 26 मिनट पर होगा।

चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने का समय

चौथा दिन छठ पर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और इस महाव्रत का पारण किया जाता है। इस साल 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 47 मिनट पर होगा। 

छठी पूजा का महत्व

छठ पूजा के दौरान सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा की जाती है। इस पूजा में भक्त गंगा नदी जैसे पवित्र जल में स्नान करते हैं। महिलाएं निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव और छठी माता के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। दूसरे और तीसरे दिन को खरना और छठ पूजा कहा जाता है। महिलाएं इन दिनों एक कठिन निर्जला व्रत रखती हैं। साथ ही चौथे दिन महिलाएं पानी में खड़े होकर उगते सूरज को अर्घ्य देती हैं और फिर व्रत का पारण करती हैं। 

 छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां

छठ पर्व के दिनों में भूलकर भी मांसाहारी चीजों का सेवन न करें। साथ ही छठ पूजा के दिनों में लहसुन व प्याज का सेवन भी न करें।
इस दौरान व्रत रख रही महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना किसी भी चीज का सेवन न करें।
छठ पूजा का प्रसाद बेहद पवित्र होता है। इसे बनाते समय भूलकर भी इसे जूठा न करें।
पूजा के लिए बांस से बने सूप और टोकरी का ही इस्तेमाल करना चाहिए। पूजा के दौरान कभी स्टील या शीशे के बर्तन प्रयोग न करें। 
साथ ही प्रसाद शुद्ध घी में ही बनाया जाना चाहिए।

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