नई दिल्ली, खुदा की इबादत करने का महीना माह ए रमजान की शुरुआत सोमवार को चांद दिखने के साथ ही मंगलवार को पहला रोजा मस्जिदों में तरावीह की नमाज के साथ खोला गया l इसके पूर्व रमजान की तैयारी के लिए बाजार पूरी तरह सजे रहे और सहरी और अफ्तार के सामान की खरीदारी के लिए लोग जुटे रहे l वहीं मुस्लिम इलाके में चहल पहल तेज रहीl
बता दें कि रमजान के पाक महीने में रोजा रखना और नमाज पढ़ना मुस्लिम समुदाय के लिए बहुत ही खास होता है। रमजान के महीने का इंतजार सभी को बहुत ही उत्साह और उमंग के साथ रहता है। रमजान के पूरे एक महीना में खुदा की इबादत की जाती है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रमजान का यह महीना नौवां महीना माना जाता है। इसकी तैयारी पिछले काफी समय से की जा रही थी।
सोमवार को चांद दिखने के साथ ही मंगलवार को पहला रोजा रखा जाएगा। इसके लिए तैयारियों में लोग जुटे रहे l यूपी के जनपद चन्दौली के डीडीयू नगर के कसाब महाल, शाहकुटी, अलीनगर, सिकटिया, दुलहीपुर, पड़ाव, नियामताबाद, बबुरी, सैयदराजा, इलिया, चकिया, चंदौली, चहनियां, धानापुर कमालपुर सहित पूरे जिले में बाजार में खरीदारों की भीड़ रही। नगर के जोटी रोड स्थित जामा मस्जिद और अलीनगर में रमजान की तैयारियों के लिए खजूर, सेवइयों, मिस्वाक (दातून), रूहआफजा सहित अन्य वस्तुओं की दुकानें सजी रही। वहीं लोगों ने तेल, बेसन सहित पकवान बनाने के सामग्री की खूब खरीदारी की।
अलीनगर जामा मस्जिद के इमाम शम्स आलम ने बताया कि चांद दिखने के साथ ही माह ए रमजान की शुरूआत हो गई है।
रमजान के दौरान रोजा रखने के नियम
रोजा रखने का मतलब सिर्फ भूखे-प्यासे रहना नहीं है, बल्कि आंख, कान और जीभ का भी रोजा रखा जाता है। यानी इस दौरान न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही किसी को बुरा कहें।
साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके द्वारा बोली गई बातों से किसी की भावनाओं पर ठेस न पहुंचे।
रमजान के महीने में कुरान पढ़ने का अलग ही महत्व होता है।
हर दिन की नमाज के अलावा रमजान में रात के वक्त एक विशेष नमाज भी पढ़ी जाती है, जिसे तरावीह कहते हैं।
रमजान का महत्व
रमजान का रोजा 29 या 30 दिनों का होता है। इस्लाम धर्म में बताया गया है कि रमजान के दौरान रोजा रखने से अल्लाह खुश होते हैं और सभी दुआएं कुबूल करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने की गई इबादत का फल बाकी महीनों के मुकाबले 70 गुना अधिक मिलता है। चांद के दिखने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग सूरज के निकलने से पहले सहरी खाकर इबादतों का सिलसिला शुरू कर देते हैं। सूरज निकलने से पहले खाए गए खाने को सहरी कहा जाता है और सूरज ढलने के बाद रोजा खोलने को इफ्तार कहा जाता है।
सहरी क्या है?
रोजे की शुरुआत सुबह सूरज निकलने से पहले फज्र की अजान के साथ होती है। इस समय सहरी ली जाती है। रमजान माह में रोजाना सूर्य उगने से पहले खाना खाया जाता है। इसे सहरी नाम से जाना जाता है। सहरी करने का समय पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है। सभी मुस्लिम लोगों को रोजा रखना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन बच्चों और शारीरिक रूप से अस्वस्थ लोगों को रोजा रखने के लिए छूट दी गई है।
इफ्तार क्या है?
दिनभर बिना खाए-पिए रोजा रखने के बाद शाम को नमाज पढ़ी जाती है और खजूर खाकर रोजा खोला जाता है। यह शाम को सूरज ढलने पर मगरिब की अजान होने पर खोला जाता है। इसी को इफ्तार नाम से जाना जाता है। इसके बाद से सुबह सहरी से पहले व्यक्ति कुछ भी खा पी सकता है।
ऐ चांद उनको मेरा पैगाम कहना,खुशी का दिन और हंसी की हर शाम कहना,जब वो देखे बाहर आकर तो उनको मेरी तरफ सेमुबारक हो रमजान कहना।
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