भारतीय साहित्यकार परिषद धनबाद की साहित्यिक संस्था का तृतीय स्थापना दिवस सांस्कृतिक रूप से उत्साह और जोश के बीच मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती माता की तस्वीर पर माल्यार्पण के साथ हुई, जिसके बाद डॉ. संगीतानाथ ने सरस्वती वंदना गीत प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष, प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार अरविंद अंशुमान सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।
कार्यक्रम का विषय प्रवेश कराते हुए रंजन कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि धनबाद में साहित्यकारों की कमी नहीं है, बल्कि आवश्यकता है एक ऐसे केंद्रीय प्लेटफॉर्म की, जहां प्रतिभाएं अपनी रचनाओं को आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकें।
मुख्य अतिथि अरविंद अंशुमान ने परिषद की स्थापना से लेकर आज तक के यात्रा पर प्रकाश डाला और आश्वासन दिया कि आगे चलकर इस परिषद का विस्तार किया जाएगा तथा प्रत्येक वर्ष काबिल साहित्यकारों को प्रमाणपत्र एवं सम्मानित किया जाएगा।
परिषद के सचिव आशीष कुमार अंबष्ट ने कार्यक्रम की संरचना एवं भविष्य रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए एक नियमित साहित्यिक पत्रिका निकालने पर जोर दिया और सदस्यता ग्रहण कर संस्था को गतिशील बनाने का आह्वान किया।
इसी कड़ी में परिषद की ओर से डॉ. राजेश कुमार को परिषद का संरक्षक नियुक्त किया गया।काफी साहित्यिक उत्साह के बीच लगभग पच्चीस साहित्यकारों ने अपनी स्वरचित कविताएं सुनाईं।
रिंकू दुबे ने “लड़ना पड़ता है यहां सबको अपना युद्ध…” से जुड़े शक्तिशाली भाव प्रस्तुत किए, जबकि प्रीति कर्ण ने “धरा श्रृंगार लिखती हूं नदी की धार लिखती…” जैसी मधुर भावनाओं से श्रोताओं का मन मोह लिया। शालिनी झा की “प्रीति की बेला मधुर तान खेला भाव बने है बादल …” जैसी पंक्तियों ने भी वातावरण को रोमांटिक बना दिया।
स्नेह प्रभा पाण्डेय ने प्रेमचंद के संदेश को आधुनिक अंदाज़ में प्रकट करते हुए “प्रेमचंद कह गए कृषक से, अपना हक तुम ले लेना” की पंक्तियों से आम जन को जागरूकता का संदेश दिया। श्याम नारायण सिंह ने “आपसी समझ‑बूझ से संवरती है जिंदगी…” जैसी शांतिपूर्ण और नैतिक भावनाओं से भरी रचनाओं से श्रोताओं को सोचने पर मजबूर किया।
विश्वजीत किरण ने शहरी जीवन और पारंपरिक मूल्यों की टकराहट को उकेरते हुए “शहर में आके अपना गांव का मकान भूल गए, स्टेट्स के चक्कर में हम बोलना भूल गए…” जैसी पंक्तियों से भावनात्मक छवि खींची। मनोज कुमार वर्णवाल की “घुट‑घुट के मरने का नहीं पैगाम जिंदगी…” जैसी पंक्तियों ने जीवन के दुःख और आशा के संतुलन पर खूबसूरत प्रकाश डाला।
जितेंद्र कर्ण ने मातृभक्ति के भाव को “मां कब तक अपने वक्ष स्थल से रक्त पिलाओगी, तुम्हारी याद बहुत आती है…” से व्यक्त किया। डॉ. संगीतानाथ ने “आना माधव हमारी द्वारिया में संग तुम्हारे खेलूंगी होली…” जैसी भक्तिपूर्ण और उत्साही पंक्तियों से माहौल को भाव‑प्रधान बनाया।
ऋचा श्रीवास्तव की “ये चंद जरा मेरा भी सुन…” जैसी प्रेमोन्मुख और आत्मगत पंक्तियों ने हृदय को छुआ, जबकि अनन्या वैद्य ने आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए “तुम जैसा सोचो और वैसा हो ये जरूरी तो नहीं…” जैसी चेतनावर्धक पंक्तियों से युवाओं को प्रेरित किया। रंजन श्रीवास्तव ने “घबराने की बात नहीं, बन न सके हम चांद‑तारा… जग सारा …” की पंक्तियों से आत्मविश्वास और हौसले का संदेश दिया।
अरविंद अंशुमान ने अपनी पंक्तियों “खुशी मिली तो हंस पड़े, ग़म मिला तो रो दिए…” से जीवन के दुख‑सुख को स्वीकार करने का संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। डॉ. मुकुंद रविदास ने “साठ बरस बाद वापस आया अपना गांव…” जैसी नोस्टैल्जिक और संवेदनशील रचनाओं से ग्रामीण बदलाव और क्षीणता पर भावपूर्ण चित्रण किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मुकुंद रविदास ने किया और अंत में अरविंद अंशुमान ने संबोधन एवं धन्यवाद ज्ञापन के साथ आयोजन का समापन किया। पूरे कार्यक्रम में साहित्य, भावना और सामाजिक विचारों का संगम श्रोताओं के लिए एक यादगार अनुभव बना।
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