पटना — पटना उच्च न्यायालय में हाल ही में सात नए न्यायाधीशों की नियुक्ति पर सामाजिक प्रतिनिधित्व के गंभीर अभाव को लेकर लोगों में चिंता और आलोचना बढ़ रही है। बहुजन समाज (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग व धार्मिक अल्पसंख्यक) से संबंधित समुदायों का नामोनिशान भी नहीं दिखने से न्यायपालिकीय नियुक्ति प्रथाओं में संरचनात्मक असमानता की आशंका और सबल हो गई है।
वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सक्षम और अनुभवी बहुजन वर्ग के अधिवक्ता उपलब्ध होने के बावजूद उनकी भागीदारी न होने से यह साबित होता है कि नियुक्ति प्रक्रिया में सवर्ण वर्चस्ववादी तंत्र का प्रभाव बना हुआ है। आलोचकों का मानना है कि यदि न्यायपालिका समाज की विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी तो न्याय के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की प्रति उसकी साख कमजोर होगी।
पटना उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम प्रणाली पर लंबे समय से पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी तथा सामाजिक बहिष्कार के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों को लेकर मांग उठ रही है कि न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया की समग्र समीक्षा कर ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और समावेशी व्यवस्था लागू की जाए जिससे सभी सामाजिक वर्गों को समान अवसर मिलें।
इस प्रकरण पर जन अधिकारों के प्रवक्ता व नेतागण भी सक्रिय हुए हैं। समाजवादी नेता चंद्रशेखर आजाद ने नियुक्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि देश के 140 करोड़ लोगों के संविधान के अनुरूप न्यायपालिका में सामाजिक विविधता का परावर्तन होना आवश्यक है।
सिविल सोसाइटी और कई एक्टिविस्ट समूहों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस कमीशन का गठन कर न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित किए जाएं। उनका कहना है कि ऐसा गठन न्यायिक संस्थानों में विश्वास बहाल करने और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
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